जब मैं कक्षा बारह में थी , तब मेरठ में पढ़ रही थी । गर्मी की छुट्टियों मैंने फल संरक्षण सरकारी संस्था से पंद्रह दिनों का कोर्स किया । इसमें मैनें कई तरह के फलों से मुरब्बा, जैम, जैली, अचार, स्कैवैस , चटनी और सॉस आदि बनाना सीखा । आज समय बदल गया है, सब कुछ बना-बनाया उपलब्ध है । फिर भी मैंने सोचा कि क्यों न सीखा हुआ सब कुछ सबके साथ बांटा जाए । मैनें ये सब कुछ जब मेरे बच्चे छोटे थे तब सब बनाया है । हर चीज स्वादिष्ट बनती है और साथ ही खराब भी नहीं होती । सबसे महत्त्वपूर्ण घर पर बनाने की वजह से इसमें बरकत है। आशा है कि शायद कुछ लोग लाभान्वित होंगे ।
जैली
जब किसी गूदेदार फल
को साबुत या बारीक टुकड़ों में काटकर पानी के साथ उबाल कर कपड़े से छानने के बाद प्राप्त
रस में चीनी, पानी और खटास की उचित मात्रा
के साथ पकाकर इतना गाढ़ा कर लिया जाता है कि उसमें चीनी की मात्रा ६५ प्रतिशत से ७०
प्रतिशत हो जाए और वह ठण्डा होने पर दही की तरह जम जाए । इस प्रकार से तैयार पदार्थ
को जैली कहते हैं ।
जैली केवल उन्हीं
फलों की बनाई जाती है जिनमें पैक्टीन की मात्रा अधिक होती है । जैली मुख्यत: अमरूद, करौंदा, सेब,
आम, कत्था आदि फलों से बनाई जाती है । इसके लिए
फल ठीक तरह से पका हुआ लेना चाहिए । ठीक तरह से पके हुए फलों को लेकर साफ पानी में
धो लेते हैं और न खाने वाले हिस्सों को निकालकर उसकी रचना के अनुसार काट लेते हैं ।
अमरूद को गोल-गोल पतले-पतले टुकड़ों में काट लेते हैं । करौदों को बीच से चीरा लगा देते
हैं । सेब और आम को भी गोल-गोल टुकड़ों काट लेते हैं ।
इस प्रकार से तैयार
फलों को भगोने में डालकर इतना पानी डालते हैं कि फल पानी में डूब जाएं । भगोने को आग
पर पकने के लिए रख देते हैं और इनको लगभग ३० से ४५ मिनट तक उबालते हैं । इसके बाद फल
को मलमल के कपड़े से बिना दबाये छान लेते हैं क्योंकि दबाने से हल्का गूदा निकल आता
है जिससे जैली पारदर्शक नहीं बनती है । छानने के बाद प्राप्त रस में पैक्टीन की परीक्षा
करने के लिए एक चम्मच रस लेकर ठंडा करते हैं । रस में दो चम्मच स्प्रिट मिला देते हैं
। फिर गिलास को प्लेट पर तिरछा करके पैक्टीन को गिराते हैं। पैक्टीन यदि एक टुकड़े में
हो तो प्रथम श्रेणी की, दो
टुकड़ों में हो तो द्वितीय श्रेणी की और दो टुकड़ों से अधिक टुकड़ों में हो तो तृतीय श्रेणी
की होती है ।
छने हुए रस को या
पैक्टीन को नाप लेते हैं । एक किलोग्राम रस में प्रथम श्रेणी की पैक्टीन हो तो ७५०
ग्राम से १ किलोग्राम तक, द्वितीय
श्रेणी की पैक्टीन हो तो आधा किलो से ७५० ग्राम तक, तृतीय श्रेणी
की पैक्टीन हो तो ३०० ग्राम से ५०० ग्राम तक चीनी मिलाते हैं। चीनी मिलाकर पकने के
लिए रख देते हैं। उबाल आने पर और चीनी घुल जाने पर उसको कपड़े से छान लेते हैं । छानने
के बाद फिर पकने के लिए रख देते हैं और उसको बिना हिलाए पकने के लिए रख देते हैं ।
पकते-पकते जब जैली काफी गाढ़ी हो जाए तो उसमें एक किलोग्राम चीनी पर ६ से १० ग्राम के
हिसाब से साइट्रिक एसिड मिला देते हैं । फिर इसके तैयार होने की पहचान ड्राप टैस्ट
के द्वारा करते हैं, प्लेट टैस्ट के द्वारा नहीं । जैली की पहचान
है- जब पकती हुई जैली की सतह चमकदार हो जाए तो जैली को तैयार समझो या फिर यदि पकती
हुई जैली में पूरे भगोने में बड़े-बड़े बुलबुले उठने लगें तो जैली को तैयार समझते हैं
। किन्तु जैली तैयार होने की सबसे उत्तम पहचान लैडल फ्लैक या शीट टैस्ट है । उसके लिए
पकती हुई जैली में एक लकड़ी का चम्मच डुबोकर बाहर निकालकर हवा में घुमा-घुमा कर ठंडा
करते हैं । पहले-पहले जैली बूँद-बूँद करके गिरती है । लेकिन बाद में एक तिकोनी चादर
के रूप में चम्मच से लटक जाती है । अगर ये चादर चम्मच में चिपकी रहे तो जैली तैयार
समझते हैं । तैयार होने से कुछ देर पहले ही साइट्रिक एसिड मिलाते हैं ।
तैयार होने के बाद
भगोने को तुरन्त आग से उतार लेते हैं । भगोने को तिरछा करके रख देते हैं । कुछ देर
के लिए जैली को छोड़ देते हैं जिससे जैली का झाग जम जाता है । झाग को चम्मच की सहायता
से निकाल देते हैं और गर्म-गर्म जैली को साफ और सुखाई हुई चौड़े मुख की शीशियों में
भरकर ठंडा होने पर ही उनका ढक्कन बंद करते हैं ।
आलूचे की जैली
सामग्री- सवा चार किलो आलूचे, पैक्टीन- ४ लीटर रस, चीनी- ढाई किलोग्राम , साइट्रिक एसिड- १५ ग्राम अथवा
साढे तीन चाय के चम्मच, पानी - जितने में फल डूब जाए
विधि- जैसे कि ऊपर लिखा है, वैसे ही जैली बनानी है ।
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